Tuesday, 21 April 2020

कोरोना में क्या खोया क्या पाया


21 दिन के लाक डाउन के बाद जब हम आंकलन करते हैं पता चलता है कि विश्व ने 2020 के 6 महीने इस महामारी के पीछे बिना कुछ किए ही गवा दिया। भारत जो त्योहारों का देश है,हम इस बार बहुत सारे पर्व जैसे नवरात्रि ,रामनवमी पहला वैशाख, शबे रात, गुड फ्राइडे, को मनाने से वंचित रह गए।

10वीं और 12वीं के विद्यार्थियों ने अपने जिंदगी के महत्वपूर्ण परीक्षा को मिस किया। उनके जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव असमंजस में पड़ गया।निजी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक रूप से काफी क्षति हुई। व्यापारिक स्तर पर बहुत नुकसान हुआ जिसकी वजह से बहुतों की नौकरी गई, बहुतो के आमदनी कम हो गई, बहुतों का छोटे व्यापार बंद हो जाएंगे। बहुत विशेषज्ञ तो इसे तीसरा विश्वयुद्ध भी कह रहे हैं जो कि अस्त्र-शस्त्र से नहीं बल्कि एक जैविक हथियार (बायोलॉजिकल वेपंस) से लड़ा गया है। यह करोना अटैक की वजह से विश्व स्तर पर लोगों की उम्र कम हो जाएगी,और विश्व ने एक नए युद्ध नीति सीख लिया।

पर इस करोना वायरस के लॉक डाउन ने हमें बहुत कुछ सिखाया और समझाया।हमें वह पुराने विचार संस्कार याद दिलाएं जिसे अब हम मॉडर्न होने के नाम पर भूल चुके थे। जैसे नमस्कार करना, शाकाहारी खाना, स्वच्छता और सफाई के साथ रहना।इस मॉडर्न जमाने में जब हम टॉयलेट पेपर, टिश्यू नैपकिन के अभ्यस्त हो चुके थे, तब इस बीमारी ने हमें फिर से हर काम के पहले हाथ धोना सिखाया, जो हमारी दादी, पर दादी सिखाया करती थी, और हम इस संस्कार को रूढी वादी बोलकर अनदेखा कर देते थे। इस कारोना की वजह हमने थोड़े दिन की आजादी खोई, पर पाया हमने बहुत कुछ, जो हमने सालों सालों में खो दिया था। पाया हमने अपनों का साथ, जो मोबाइल टीवी और काम के प्रेशर ने छीन लिया था।बहुत सालों बाद आज घर के सभी सदस्य मिलकर एक साथ खाना खा रहे हैं, हंस रहे बोल रहे हैं ,और अपनों के साथ वक्त बिता रहे हैं।
खोया बच्चों ने कुछ दिन के स्कूल के क्लासेस, पर पाया भी उन्होंने खुद से पढ़ने की जरूरत। जहां आजकल बच्चे ट्यूशन, एक्स्ट्रा क्लासेस पर निर्भर हो गए थे खुद से पढ़ना शायद भूल ही गए थे।उनको अपने रुचि समझने का भी लिए टाइम नहीं था आज उनके पास टाइम ही टाइम है कि वह पढ़ाई के साथ अपना कुछ मनपसंद काम कर सके।


मर्दों को सिखाया कि घर सिर्फ सोने और खाने के लिए नहीं होता। शायद वर्षों बाद मर्दों ने इतना समय घर में बिताया होगा। लाक डाउन के बाद उन्हें घर से ज्यादा अपनत्व लगे।इस लॉक डाउन ने उन्हें घर का काम करने के लिए भी मजबूर किया, वहीं बहुतों ने चाव से अपने पत्नियों का, मां का हाथ बटाया।शायद बहुत घरों में बहुत दिनों बाद या पहली बार मर्दों के हाथ का बना कुछ खाया होगा सबने।

इस करोना लॉक डाउन ने तो सिर्फ मर्दों और बच्चों को ही नहीं हम लेडीस को भी बहुत कुछ सिखा दिया। हमें सही मायनों में मॉडर्न बना दिया। जहां एक तरफ हमें बताया कि हमारे संस्कार पुराने और रूढ़िवादी नहीं बल्कि बहुत ही वैज्ञानिक है, और इस 21वीं सदी में भी इनका औचित्य है वही हमें यह मोबाइल लैपटॉप डेस्कटॉप जैसे गैजेट के और करीब ले आया। लॉक डाउने हमें यह भी सिखाया कि हम घर रह कर भी कैसे एक दूसरे से जुड़े रह सकते हैं।

 हमें मिनिमलिस्ट की जिंदगी जीना सिखाया। मिनिमलिस्ट मतलब न्यूनतम वादी अर्थात व्यक्ति जो कम से कम जरूरतों में अपनी जिंदगी जी सकते हैं आज के दिन हमने यह सीखा आज 1 महीने से हमने कोई शॉपिंग नहीं की, पिक्चर देखने नहीं गए, होटल नहीं गए, फिर भी हम जिंदा हैं और बहुत खुश हैं। और जब इन सब सुविधाओं से हमारा मन हटता है तब हम जिंदगी के सही मायने समझ पाते हैं।इस लॉक डाउन में अगर हमने मिनिमलिस्ट की जिंदगी जीना सीख लिया तो शायद हम में से बहुत डिप्रेशन ब्लड प्रेशर, एंजाइटी जैसे मॉडर्न बीमारियों से हम विजय प्राप्त कर लेंगे।
समाजिक स्तर पर इसने फिर से वह सोई हुई करुणा भाव सभी में जगा दिया।आज सभी प्रयासरत हैं कि कोई भी इस महामारी संकट के समय भूखा ना सोए सब एक दूसरे के साथ फिर एकजुट होकर खड़े हैं।  इस करुणा ने हम लोगों को एकजुट ही किया है।

इसलिए हम कह सकते हैं कि करोणा वायरस में हमें आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय स्तर पर क्षति जरूर पहुंचाई है लेकिन हमें व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर हमें एक बेहतर इंसान बनाया है।